
मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के नेतृत्व वाले एक अध्ययन के अनुसार, रासायनिक लूपिंग रिफॉर्मिंग उन उद्योगों के लिए कम-कार्बन हाइड्रोजन का व्यावहारिक रास्ता बन सकती है जिन्हें बिजली से चलाना कठिन है। शोध में हाइड्रोजन उत्पादन को कार्बन कैप्चर के साथ जोड़ा गया और यह भी परखा गया कि यह तकनीक वास्तविक औद्योगिक पैमानों पर कैसे काम कर सकती है।
मुख्य तथ्य
- अध्ययन का नेतृत्व द यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के शोधकर्ताओं ने किया और इसे Carbon Capture Science & Technology में प्रकाशित किया गया।
- तकनीक का मूल्यांकन दो प्रतिनिधि पैमानों पर किया गया: 2 मेगावाट का संयंत्र और 600 मेगावाट की सुविधा।
- सबसे उन्नत डिज़ाइनों में थर्मल दक्षता 75% तक और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन पकड़ने की क्षमता 90% से 99% तक रही।
- यह काम औद्योगिक साझेदारों के साथ और RECYCLE नामक 5.1 मिलियन पाउंड की परियोजना के तहत किया गया, जिसे डिपार्टमेंट फॉर एनर्जी सिक्योरिटी एंड नेट ज़ीरो ने वित्तपोषित किया।
छात्रों, शोधकर्ताओं और उद्योग के लिए इसका क्या मतलब है?
यह अध्ययन उन शोधकर्ताओं, अभियंताओं और औद्योगिक निर्णयकर्ताओं के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है जो भारी उद्योग, रसायन और रिफाइनिंग जैसे उन क्षेत्रों के कार्बन उत्सर्जन को घटाना चाहते हैं, जहां बिजलीकरण आसान नहीं है। यह ऐसा विकल्प सामने रखता है जो स्थानीय अवसंरचना, ऊष्मा एकीकरण की संभावनाओं और नीति स्थितियों के अनुसार छोटे औद्योगिक स्थलों से लेकर बड़े हाइड्रोजन संयंत्रों तक अलग-अलग रूपों में लागू हो सकता है।
रसायन अभियंत्रण के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए यह अध्ययन इस बात का ठोस उदाहरण है कि रिएक्टर डिज़ाइन, प्रक्रिया मॉडलिंग और संयंत्र-स्तरीय आकलन को मिलाकर यह परखा जा सकता है कि कोई उभरती तकनीक केवल सैद्धांतिक न रहकर व्यवहार में भी काम कर सकती है या नहीं। टीम ने वाल्व के प्रदर्शन, ऊष्मा एकीकरण की जरूरतों और सुरक्षा संबंधी पहलुओं जैसी व्यावहारिक बाधाओं का भी आकलन किया।
- छोटे पैमाने का विकल्प: विकेंद्रीकृत औद्योगिक उपयोग के लिए उपयुक्त 2 मेगावाट संयंत्र।
- बड़े पैमाने का विकल्प: बड़े औद्योगिक हाइड्रोजन मांग के अनुरूप 600 मेगावाट सुविधा।
- संभावित आउटपुट: अध्ययन के अनुसार लगातार संचालन में ये पैमाने क्रमशः लगभग 5,000 घरों और 1.5 मिलियन घरों की बिजली जरूरत के बराबर ऊर्जा दे सकते हैं।
रासायनिक लूपिंग रिफॉर्मिंग पारंपरिक हाइड्रोजन उत्पादन से कैसे अलग है?
रासायनिक लूपिंग रिफॉर्मिंग में ठोस ऑक्सीजन-वाहक पदार्थ ऑक्सीजन को प्रतिक्रियाओं की एक श्रृंखला में ले जाते हैं, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड स्वाभाविक रूप से केंद्रित और अलग हो जाती है और साथ ही ऊष्मा पैदा होती है। यही ऊष्मा मीथेन और भाप को हाइड्रोजन-युक्त सिंगैस में बदलने की प्रक्रिया चलाती है, इसलिए इसमें अलग से कैप्चर सिस्टम पर निर्भर रहने के बजाय प्रक्रिया के भीतर ही कार्बन कैप्चर शामिल होता है।
शोध दल ने क्या पाया?
शोधकर्ताओं ने पाया कि सबसे उन्नत प्रक्रिया डिज़ाइन उच्च दक्षता दे सकते हैं और उत्पन्न कार्बन का अधिकांश भाग पकड़ सकते हैं। कई परिदृश्यों में प्रणाली ने अतिरिक्त भाप भी उत्पन्न की, जिसे बाहरी उपयोग के लिए भेजा जा सकता था, जिससे पर्यावरणीय प्रदर्शन और बेहतर हुआ। टीम के अनुसार, बड़े पैमाने पर प्रक्रिया दक्षता के प्रमुख मानकों में रासायनिक लूपिंग रिफॉर्मिंग स्थापित कम-कार्बन हाइड्रोजन मार्गों की तुलना में बेहतर साबित हुई।
सह-लेखक प्रोफेसर विंचेनज़ो स्पालिना ने कहा कि यह काम सिंगैस और हाइड्रोजन उत्पादन तथा भविष्य की तैनाती के लिए रासायनिक लूपिंग की भूमिका को मजबूत करता है। प्रमुख लेखिका डॉ. इसाबेल पास्मीनो-मायोर्गा ने कहा कि यह शोध दिखाता है कि यह तकनीक प्रक्रिया के दौरान बने अधिकांश कार्बन को भंडारण या फीडस्टॉक के रूप में उपयोग के लिए पकड़ते हुए कम-कार्बन हाइड्रोजन कुशलता से दे सकती है।
तैनाती अभी भी किन शर्तों पर निर्भर है?
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि हाइड्रोजन उत्पादन का सर्वोत्तम तरीका स्थानीय ऊर्जा प्रणालियों, अवसंरचना और नीतियों पर निर्भर करेगा। उनके अनुसार, जहां औद्योगिक ऊष्मा एकीकरण के अवसर मौजूद हों और कम-कार्बन बिजली सीमित हो, वहां रासायनिक लूपिंग रिफॉर्मिंग विशेष रूप से आकर्षक विकल्प बन सकती है। अध्ययन का महत्व इसी व्यावहारिक दृष्टिकोण में है: यह तकनीक को सर्वत्र सर्वोत्तम नहीं मानता, बल्कि ऐसे औद्योगिक संदर्भों के लिए उपयुक्त विकल्प के रूप में पेश करता है जहां इसकी उपयोगिता अधिक हो सकती है।
यह काम RECYCLE नामक एक सहयोगी परियोजना का हिस्सा था, जिसे डिपार्टमेंट फॉर एनर्जी सिक्योरिटी एंड नेट ज़ीरो ने समर्थन दिया। अध्ययन 19 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित हुआ।

